बहुत बहुत दूर by Aranya Dutta

उस दिन के सूर्योदय की मुखाकृति में

वैसी तो थी न भिन्नता कोई।

प्रभात की पहली किरण अभी मार्किन राज्यों पर पड़ी ही थी,

और जाग उठा था चपलता भरा एक संसार नया,

एक संपन्न, शांत दुनिया थी जो सोई हुई।



सदा सुहावने प्रकृति का

उस दिन भी कोई जवाब न था।

आकाश पट पर था फैला नीला वर्ण गहरा।

लेकिन भला किसने सोचा था

कि उसी आसमान को चीरता हुआ

पर्दाफ़ाश होगा उस रोज़

मनुष्य का एक ऐसा अंदेखा, ऐसा अंजाना चेहरा?

काल ग्रस्त थे वे विश्व विख्यात

'जुड़वे' दो गगनस्पर्शी इमारत,

एवं उन इमारतों में कैद मासूम हृदयों

की थी इस तरह फूटी किस्मत,

आखिर किसने कल्पना की थी

कि इतिहास के पन्नों पर होगा इस प्रकार अंकित भी,

एक ऐसा भयंकर हादसा, जिसकी स्मृति तक होगी

केवल लहू से लथपत?


ऐसा प्रतीत हुआ मानों शहर के बीचोबीच कोई सूर्यास्त हुआ हो,

फ़र्के सिर्फ इतना कि इस सूर्यास्त में

संध्या की शांति व नीरवता नहीं थी कहीँ भी,

बस थी लोगों की चीखें, खौफ़ व देहशत भरी।

मानव